नशा

दफ़्तर की घड़ी में चार बजे हैं |  आज फिर रमेश का मन शराब पीने को कर रहा है | पिछले चार दीनो से घर-परिवार की समस्याएँ उसे बहुत चिंतित कर रही है | उसके परिवार में उसकी पत्नी के अलावा उसकी बेटी है | दूसरी बेटी का जन्म पिछले महीने ही हुआ | तब से उसने खुद को संभाला लेकिन पिछले मंगलवार सीमा से बेटी को लेकर कहासुनी हो गयी | तभी से चिंता को अपनी कंधो पर संभाले घूम रहा है |

पाँच बज रहे है | रमेश ने दफ़्तर का काम ख़त्म किया और छ: बजे दफ़्तर से रवाना हो जया | घर से चार किलोमीटर दूर विदेशी शराबों की दुकान थी | गाड़ी को किनारे रोककर रमेश दुकान के अंदर चला गया | जमकर शराब पी कर करीब साढे आठ बजे वह घर को रवाना हुआ | नशे में धुत रमेश साठ किमी. प्रति घंटा से गाड़ी चला रहा था | तभी अचानक उसकी कार के सामने एक औरत और उसके दो बेटियाँ आ गयी  और रमेश की कार ने बेरहमी से कुचल दिया | रमेश ने ब्रेक लगाया | उस सुनसान सड़क पर रमेश चाहकर भी भाग न सका | गाड़ी से उतरकर उसने उन्हे बचाना चाहा, पर तब तक देर हो चुकी थी | तीनो लोग मर चुके थे |

रमेश ने पास जाकर देखा तो कलेजा ही फट्गया – पैरों तले ज़मीन खिसक गयी – आँखें भर आ गयी |वह मृतक औरत कोई और नही उसकी पत्नी सीमा थी | और दोनो लड़कियाँ उस्की अपनी दोनो बच्चियाँ थी | उसका सारा संसार थम सा गया था |

उसकी जिंदगी मे आए इस तूफान ने उसे हिला कर रख दिया | उसकी जिंदगी जीने का ‘नशा’ आज उतर गया था| ऐसा नशा जिसने उसे आजतक सम्भहाल कर रखा अब काफूर हो गया | अब उसके आँसू नही थम रहे थे | उसकी जीवन का नशा जा चुका था |

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